Sunday, May 29, 2011
Saturday, May 21, 2011
सोचो ना.....
छन सी गुज़रे
यूँ ख्वाब को समेट कर
खिल सी गुज़रे
यूँ लहरा के आँचल लिए
थम सी हाय ..........!
यूँ धड़कने बढ़ाती जाए ...
ये चूड़ियों की खन- खन,,,,,,, हाय ..... !
कहती जाए .... यूँ थाम के बैठो ,, अपने दिल को , खिल के झूमो
धीमे- धीमे तुम होंठों से ,,,,,,,, अब मुस्कुरा दो......
देखो ना ..... देखो ना ......
है ये बात छोटी सी
पल दो पल कहने को पड़ी है उम्र पूरी कुछ कहो नज़रों से ,,, बातें रहने दो अधूरी
कह भी दो ,,, सोचो ना.....
इंतज़ार है ,,,,,, इंतज़ार है तुम्हारा ......................
यूँ ख्वाब को समेट कर
खिल सी गुज़रे
यूँ लहरा के आँचल लिए
थम सी हाय ..........!
यूँ धड़कने बढ़ाती जाए ...
ये चूड़ियों की खन- खन,,,,,,, हाय ..... !
कहती जाए .... यूँ थाम के बैठो ,, अपने दिल को , खिल के झूमो
धीमे- धीमे तुम होंठों से ,,,,,,,, अब मुस्कुरा दो......
देखो ना ..... देखो ना ......
है ये बात छोटी सी
पल दो पल कहने को पड़ी है उम्र पूरी कुछ कहो नज़रों से ,,, बातें रहने दो अधूरी
कह भी दो ,,, सोचो ना.....
इंतज़ार है ,,,,,, इंतज़ार है तुम्हारा ......................
Sushmita ......
Tuesday, March 29, 2011
सिलवटें ........
बिखरे पन्नो में वो टेढ़ी - मेढ़ी रेखाएं
जैसे उबड़- खाबड़ सी लगती राहें
वो गीली रेत को नम करती थी लहरें
जैसे पानी पर रौशनी चाँद की चमके
आँखें मूंदे हाथों से छिपाती नज़रें
जैसे बंधन तोड़ हवा खिड़की से गुज़रें
जैसे गुनगुन-सी आवाज़ ने ये लम्हा रोका
गुलाबी चादर में लिपटा एक तन
जैसे मूरत- सा बन बैठा ये पल
सिलवटें थी चादर की दूर कहीं
जैसे करवट बदलती सुबह वहीं
जैसे करवट बदलती सुबह वहीं
जैसे बिखरे थे वो पन्ने साथ में तेज लहरें ......
Sushmita....
Wednesday, November 24, 2010
ठहर जाने दो .....
खोई खोई सी ये फिज़ा
खोई खोई सी हूँ मैं
जो कहती है सर्द हवा
तो खो जाती हूँ मैं
इस भीड़ में चलते हुए तो खो जाती हूँ मैं
शायद सब से जुदा हूँ मैं
जो खोई है सब में कहीं
वो अजब पहेली हूँ मैं
कुछ और नहीं
सिर्फ आपके दिल की आवाज़ हूँ मैं....
बादलों में छुपा सूरज कुछ यूँ मुस्कुरा रहा था , जब तलाश रही थी नज़रें उसको तो एक ख्याल आ रहा था ...
सामने गाड़ियो की लम्बी कतार , एक के पीछे एक बस जल्दी थी तो ग्रीन लाइट क्रोस करने की . रिक्शे में बैठे ग्रीन लाइट के इंतज़ार में देखने लायक नज़ारा था तो बस ,,, traffic का . इसी बीच एक खुबसूरत- सा पल गुजारिश कर रहा था कि कोई नज़र उसको कैद कर ले और ले जाये अपने साथ . पटरी पर कबूतर traffic के शोर से इधर- उधर बिखर गए ........ उस उड़ान को देखते ही देखते जब देखा आसमान कि ओर तो बहुत अच्छा लगा. एक टक निहारती रही फिर मुस्कुराई , सोचने लगी इस भीड़ से हट कर भी एक दुनिया है ....
पता ही नहीं चला कब रेड लाइट ग्रीन हो गयी और सब के साथ फिर वही एक के पीछे एक वाहन ...... रिक्शा वाले भैया ने कब फुर्ती से ग्रीन लाइट क्रोस की और वो सर्द हवा मुझे छू कर अपने होने का एहसास दे गयी पर कुछ देर तक वहीं..........
खोई खोई सी थी मैं .....
Sushmita....
Saturday, November 20, 2010
क्यूंकि बूढ़ा हो चला हूँ मैं .....( एक ख़त )
जिन आँखों में सपने हुआ करते
अब उन आँखों की रौशनी धुंधलाने लगी
उन नन्हे कदमो से
एक गीत गुनगुनाने लगी
जिन नन्हे कदमो को बढ़ना सीखाया
उन नन्हे कदमो से एक सपना सजाया
अब उन कदमो में जान नहीं
जहाँ लाड -दुलार ने बचपन बिताया
क्यूंकि बूढ़ा हो चला हूँ मैं .....
सहारा है सफ़र में
एक लाठी का
किस को सुनाऊ मन की बात
कहने को है बहुत-सी बात
ढूंढ़ता हूँ परछाई में
अपनी ही परछाई
आँखों के आंसू भी
तरसते है उस स्पर्श को
जीवन के हर मोड़ पर
कड़ी से कड़ी जोड़ता चला
एक राही हूँ इस सफ़र का
अकेला ही तड़पता रहा
क्यूंकि बूढ़ा हो चला हूँ मैं .....
Kyunki Boodha Ho Chala Hun Main..... (ek khat)
jin aankhon me sapne hua karte
un aankhon ki roshani dhundhlaane lagi
un nanhe kadmon se
ek geet gungunane lagi
jin nanhe kadmon ko badhna sikhaya
un nanhe kadmon se ek sapna sajaya
ab un nanhe kadmon me jaan nahi
jahan laad-pyaar me bachpan beetaya
kyunki boodha ho chala hun main........
sahara hai safar me
ek laathi ka
kis ko sunau apne mann ki baat
kehne ko hai bahut si baat
dhundhta hun parchhai me
apni hi parchhai
aankhon ke aansu bhi taraste hai
us sparsh ko
jeevan ke har modh par
kadi se kadi jodhta chala
ek raahi hun is safar ka
akela hi tadapta raha
Kyunki boodha ho chala hun main......
Sushmita ...
Friday, October 22, 2010
चले उस पार ...
ख़्वाबों को समेटे हुए
हर पल से गुज़र बैठे.....
अक्सर ख्यालों में कुछ अजीब दिलकश हमारी सोच पंख लगा कर उड़ान भरने लगती है , यह उड़ान मीलों दूर की हो या पास की .....क्या फर्क पड़ता है .बस अब तो उड़ान भर चुके , यह डोर कहा तक जाए कुछ पता नहीं .
उस ख्वाब की गहराई तक पहुंचना है .
पहुंचना है उस एहसास तक जिसे महसूस किया पल भर में .
ज़रा एक कोने में बैठ जाइए और सुनिए अपने मन की आवाज़.
. . . बहुत कुछ कहना चाहती हूँ ... पर शब्द नहीं मिलते , शब्द मिलते है तो बयान नहीं कर पाती ..... कोशिश है हर पल को खूबसूरती से कैद कर उन्हें शब्दों के सहारे जान डाल दी जाये वो दृश्य जीवित रूप में हम सब के सामने दिखाई दे ताकि हरी-हरी पत्तियों के बीच ये फूल लहरातें दिखाई दे ..
बारिश की हर एक-एक बूँद आपको अपनी ओर आकर्षित करती है , शायद इसलिए क्यूंकि मन कुछ तो कहता है . . . खुले आसमान के नीचे आँखे बंद कर हाथ फैलाए एक ही जगह पर घूमना , चेहरे पर मुस्कान ले आता है . शाम के वक़्त हाथ में चाय की प्याली लिए बालकोनी से बाहर का नज़ारा खूब भाता है . आपके कुछ अपने पल याद दिलाना चाहती हूँ , ऐसे ही कुछ पल जरुर अपने आप के लिए संभाल कर रखे क्यूंकि इस पर न तो किसी का कोई हक होता न किसी की रोक-टोक . सिर्फ आपके खुबसूरत पल..... जिसे याद करते वक़्त आप हमेशा खुश रहते है. यूँ तो मुस्कुराना हमें भी आता है
यूँ तो पलों को जीना हमें भी आता है
शब्दों में कैद कर यहाँ तक पहुंचाना
उन्हें एक जान देना , हमें नहीं आता है .....
Sushmita...
Monday, October 18, 2010
कुछ बातें .....
सफ़र कुछ बातों.. का
यूँ ही गुज़र ना जाए ,,
ये लम्हा समय रथ पर सवार
कहीं बीत ना जाए ..
एक गुजारिश है
समय से, बस ठहर जाए
आप और हम यूँ ही
कुछ बातें कहते जाए.....
सोचती हूँ ' कुछ बातें ' .. कुछ ख़ास नहीं , पर फिर भी लगाव है इससे . कुछ अपना है हमेशा से........
काफी दिन बीत गए कुछ कहने का मन ही नहीं हुआ , 2 -4 बातें ही होती है कहने को . पहले मैंने सोचा अब आगे कुछ नहीं लिखूंगी , पर ऐसा हो ही नहीं सकता क्यूंकि मुझे खुद ही कुछ अधूरा-अधूरा लगने लगता है . देखिये इस बेंच की ओर
कुछ ऐसा ही लगता है मुझे अपना ब्लॉग .. नहीं जानती क्यों ?
समय कुछ ख़ास नही रात के 12 :20 बजे है घड़ी में . याद आने लगा है जब पिछली सर्दियों में मैं यूँही रोज़ कुछ लिखती थी और लिखते-लिखते हाथ ठण्ड से बेजान हो जाते . उस समय अच्छा लगता था रोज़ रोज़ कुछ लिखना , बातें करना . . . आज मन नहीं ये ब्लॉग अधूरा ही रहने वाला है ...
उम्मीद करती हूँ आप मेरा ब्लॉग पढ़ कर मेरा हौसला बढ़ाएंगे ... जिससे ' kuch baatein.... ' का सफ़र चलता रहे .....
समय कुछ ख़ास नही रात के 12 :20 बजे है घड़ी में . याद आने लगा है जब पिछली सर्दियों में मैं यूँही रोज़ कुछ लिखती थी और लिखते-लिखते हाथ ठण्ड से बेजान हो जाते . उस समय अच्छा लगता था रोज़ रोज़ कुछ लिखना , बातें करना . . . आज मन नहीं ये ब्लॉग अधूरा ही रहने वाला है ...
उम्मीद करती हूँ आप मेरा ब्लॉग पढ़ कर मेरा हौसला बढ़ाएंगे ... जिससे ' kuch baatein.... ' का सफ़र चलता रहे .....
Sushmita...
Subscribe to:
Posts (Atom)







