Thursday, November 10, 2011

कशमकश / kashmakash .......

गर न होते वो काग़ज़ों के ढेर
न बसते वो दिन के पहर

गर न होते वो काग़ज़ों के ढेर
न बसते उनके मुस्कुराहटों के सेहर

जो पन्ने थे एक धागे में पिरोए
उसको सहज, संभाल कर रखती थी मैं

जब जी चाहता था उनसे मिलने को
तो रंग भर देती थी कोरे काग़ज़ों को

कभी तो समेट बैठती उन पत्तों को
इस आस में, कहीं ये तेरे देस तेरे पास से गुज़रे हो ...

फिर पलके झुका कर मुस्कुरातें हुए
उठा कर कलम ,, रंग भर देती थी कोरे काग़ज़ों को
                                                                                






फिर सोचती थी कुछ पल अधूरे न होते  तो
न होते हम , न अधूरे होते तुम
न पिघलती ये शमा , न सरसराती हवाएं न लहराते ये परदे, न दूर जाते तुम.........








gar na  hote wo kaaghazon ke dher
na baste wo din ke pehar
gar na hote wo kaaghazon ke dher 
na baste unke muskurahaton ke sehar
jo panney the ek dhaage me piroye
unko sehaz, sambhaal kar rakhti thi main

jab jee chahta unse milne ko
to rang bharti thi korey kaaghazon ko

kabhi to samet baithti un patton ko
is aas me, kahin ye tere desh tere paas se guzre ho

phir palkey jhuka kar, muskuraatein huey
utha kar kalam ,rang bharti thi korey kaaghazon ko

phir sochti kuch pal adhure na hote to
na adhure hote hun, na adhure hote tum...
na pighati ye shama, na sarsaraati hawa
na lehraate parde ,,,,,, na door jate TUM..........



ye ek aisi zindagi hai,, jo aaj bhi jee uthti hai uski yaad me.... ye jaante huey bhi ki uska humsafar kabhi laut kar wapas nahi aa sakta ..... par wo aaj bhi jee uthti hai uski yaadon ke sahaare .... kyunki uska humsafar is duniya me na hote huey bhi uski yaadon me aaj bhi shaamil hai......




Sushmita.....

Friday, July 22, 2011

एहसास ....


यूँ तो सौ बहाने किया करते
हर वक़्त छू कर गुज़रा करते

न जाने कशिश कहे या कसक
सोचते रहे अब तलक

हर दफा नज़रों से होती गुफ़्तगू
चलो ना ... अब होंठों से गुस्ताखी करू

दीदार करते रहे यूँ ही
छंटने दो काली घटा को फिर यहीं

यूँ तो हर वक़्त ज़हन में नाम तेरा आता है
फिर हवा का एक झोखा तेरे होने का एहसास दिला जाता है ..

आँखों को मूँद एक गहरी सांस बन,,
मुझ में समा जाते हो....

फिर क्यों तुम मुझसे
ऐसी लुक्का- छिप्पी करते हो   .... ??













yun to sau bahaana kia krte
har waqt chhu kr guzra krte

na jaane kashish kahe ya kasak
sochte rahey ab talak

har dafa nazro s hoti guftgu
chalo na ... ab hoonthon s gustaakhi karu..


deedaar karte rahe yunhi
chhntney do kaali ghata ko phir yunhi 

yun to jehan me har waqt naam tera aata hai
phir hawa ka ek jhokha tere hone ka ehsaas dila jata hai

aankhon ko moonde ,, ek gehri saans ban
mujhme sama jaate ho...

phir kyu tum mujhse
aise lukka chhippi karte ho.....  ??
 

Sushmita...

 


Wednesday, June 1, 2011

बातें ...

देखा मैंने उसको नन्हे क़दमों से
आगे बढ़ते हुए

बिखरे बाल , सांवला तन
इधर-उधर की चहल-पहल को निहारती नज़रें

न कल का पता न आज का
बस निकल पड़ा सर पर एक पोटली लिए

जाने क्या था उसमें, पर उसकी चाल से
भारी सामान- सा मालूम हुआ

जहाँ उसके हाथों में किताबें
बस्ते का बोझ होना था  कन्धों पर

वहीं जूझ रहा था वो
उस पोटली के बोझ से ,,

सच तो है ,, उसके माथे पर कोई शिकन नहीं
है तो बस इस समय से अज्ञात

जाने क्या थी उसकी मज़बूरी                
या थी किसी और की सज़ा

ये सज़ा नहीं तो और क्या
कभी न कभी तो रूबरू होगा वो बीते अपने इस समय से .............



कभी कभी तो सोचती हूँ ये ज़िन्दगी ही क्या है , पर इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं . . . फिर बात कहाँ से कहाँ तक पहुँच जाती है , ऐसे में बस मन करता है इस बारे में सोचना ही बेकार है ...

चलते है वापिस ,,,,
  हाँ देखा था एक रोज़ मैंने एक बच्चे को .  राह पर चलते हुए उसने अनजाने में मेरा ध्यान अपनी ओर खींच ही लिया था . वो चलता गया आगे , एक हाथ उसका पोटली सँभालते हुए वहीं दूसरा हाथ आगे पीछे लहराते हुए . कुछ २ मिनट तक का था यह मंज़र .........

बीच में किसी बात का ज़िक्र था वो बात अधूरी रह गयी ,,, चलिए आज नहीं फिर कभी सही ...........


Sushmita.....

Sunday, May 29, 2011

Tum..........


इस अँधेरे कमरे में सुनाई दी वो सिर्फ 
आवाज़ तुम्हारी है  ,,                                                       

उस लहराते परदे के पीछे 
आहत तुम्हारी है ,,

कोई ख्वाब-सा चुन ले अगर 
वो बात तुम्हारी है ,,

कोई कहे तुम यहाँ नहीं 
मुझे मालूम है 
परछाई तुम्हारी है ..... 


























                                                                   Sushmita....

Saturday, May 21, 2011

सोचो ना.....

छन सी  गुज़रे
यूँ ख्वाब को समेट कर

खिल सी गुज़रे
यूँ लहरा के आँचल लिए

थम सी हाय ..........!
यूँ धड़कने बढ़ाती जाए ...

ये चूड़ियों की खन- खन,,,,,,,  हाय ..... !
कहती जाए .... यूँ थाम के बैठो ,, अपने दिल को , खिल के झूमो
धीमे- धीमे तुम होंठों से ,,,,,,,, अब मुस्कुरा दो......

देखो ना  ..... देखो ना  ......
है ये बात छोटी सी

पल दो पल कहने को पड़ी है उम्र पूरी                                                     कुछ कहो नज़रों से ,,, बातें रहने दो अधूरी  
                                 
कह भी दो ,,, सोचो ना.....
इंतज़ार है ,,,,,, इंतज़ार है तुम्हारा ......................





















Sushmita ......

Tuesday, March 29, 2011

सिलवटें ........


बिखरे पन्नो में वो टेढ़ी - मेढ़ी रेखाएं
जैसे उबड़- खाबड़ सी लगती राहें                                         

वो गीली रेत को नम करती थी लहरें
जैसे पानी पर रौशनी चाँद की चमके 

आँखें मूंदे हाथों से छिपाती नज़रें
जैसे बंधन तोड़ हवा खिड़की से गुज़रें

जुल्फों को लहराता यूँ हवा का झोखा
जैसे गुनगुन-सी आवाज़ ने ये लम्हा रोका

गुलाबी चादर में लिपटा एक तन
जैसे  मूरत- सा बन बैठा ये पल

सिलवटें थी चादर की दूर कहीं  
जैसे करवट बदलती सुबह वहीं 

कुछ यूँ बीती रात से,, क्या पूछे     
जैसे बिखरे थे वो पन्ने साथ में तेज लहरें ......


         Sushmita....

Wednesday, November 24, 2010

ठहर जाने दो .....


खोई खोई सी ये फिज़ा
खोई खोई सी हूँ मैं 
 
जो कहती है सर्द हवा
तो खो जाती हूँ मैं

इस भीड़ में चलते हुए 
शायद सब से जुदा हूँ मैं

 जो खोई है सब में कहीं 
 वो अजब पहेली हूँ मैं

 कुछ और नहीं
 सिर्फ आपके दिल की आवाज़ हूँ मैं....
        

       बादलों में छुपा सूरज कुछ यूँ मुस्कुरा रहा था , जब तलाश रही थी नज़रें उसको तो एक ख्याल आ रहा था ...
सामने गाड़ियो की लम्बी कतार , एक के पीछे एक बस जल्दी थी तो ग्रीन लाइट क्रोस करने की . रिक्शे में बैठे ग्रीन लाइट के इंतज़ार में  देखने लायक नज़ारा था तो बस ,,, traffic का . इसी बीच एक खुबसूरत- सा पल गुजारिश कर रहा था कि कोई नज़र उसको कैद कर ले और ले जाये अपने साथ . पटरी पर कबूतर traffic के शोर से इधर- उधर बिखर गए ........ उस उड़ान को देखते ही देखते जब देखा आसमान कि ओर तो बहुत अच्छा लगा. एक टक निहारती रही फिर मुस्कुराई , सोचने लगी इस भीड़ से हट कर भी एक दुनिया है ....
     पता ही नहीं चला कब रेड लाइट ग्रीन हो गयी और सब के साथ फिर वही एक के पीछे एक वाहन ...... रिक्शा वाले भैया ने कब फुर्ती से ग्रीन लाइट क्रोस की और वो सर्द हवा मुझे छू कर अपने होने का एहसास दे गयी पर कुछ देर तक वहीं..........
खोई खोई सी थी मैं ..... 
  
                                                      Sushmita....