Wednesday, June 20, 2012

phir yunhi....

बादलों में छिपी तस्वीर को
खोजती हूँ मैं
उस नारंगी आसमान में
खो जाती हूँ मैं

छप छप की बूंदों से
पेट भरती हरी- हरी पत्तियां
मिट्टी की सोन्दी सोन्दी महक
एहसास लिए फिर
सोचती हूँ मैं ,,

यूँ खुदा भी अपनी कुदरत पर
इतना इतराता होगा ......
जाने कैसे कैसे ख़याल
अपने जेहन में लाता होगा?

कर गरूर तू अपनी कुदरत पर
है सच तो यही
ढूंढ़ लेती हूँ मैं
सौ बहाने जीने को

ज़रा थम जा , ऐ हवा
मेरी सोच ने ले ली है करवट 
मेरा एहसास लिए
तू उसकी ओर जाना

कह देना-
हर शाम होती है मुलाक़ात
तेरे नाम से , तेरे ख्याल से ,,
अब तो लगता है
ये हवा भी करती है साज़िश

हर शाम तू अपने ख्याल में
लेना मेरा नाम
बन कर तेरे चेहरे की मुस्कान
पहुँच जाउंगी तेरे पास ....... 
















Sushmita...


Badalon me chupi tasveer ko
khojti hun main
us naarangi aasman me
kho jati hun main

chhap chhap ki boondon se
pet bharti hari-hari pattiyan
mitti ki sondi sondi mehak
ehsaas liye phir
sochti hun main....

yun Khuda bhi apni kudrat pr
itna itraata hoga
jaane kaise kaise khayal
apne jehan me laata hoga

kar garoor tu apni kudrat pr
hai sach to yahi
dhundh leti hun main 
sou bahaane jeene ko

zara tham ja ae hawa..
meri soch ne le li hai karwatein
mera ehsaas kiye
tu uski aurr jana

keh dena-
har shaam hoti hai mulaqat
tere naam se, tere khayal se
ab to lagta hai
ye hawa bhi karti hai saazish

har shaam tu apne khayal me
lena mera naam
ban kar tere chehre hi muskaan
pahunch jaungi tere paas......

Sushmita...

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